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लोकेश

 कहानी  हेमराज भट्ट  ‘कुमार’

 

सदा चुपचुप रहने वाले लोकेश ने प्राचार्य के अपमान को देख ऐसी क्या हिम्मत दिखाई कि न सिर्फ उस ने आंदोलनकारियों से प्राचार्य को बचाया बल्कि उन्हें गलती का एहसास भी करवा दिया?

लोकेश विद्यालय में नयानया आया था. वह 8वीं कक्षा का छात्र था. वह अधिकतर गंभीर रहता था. बहुत कम बोलता था और कक्षा में एकदम अलग बैठता था. खेलते समय भी वह एक कोने में अकेला खड़ा दिखाई देता. उस का कोई दोस्त नहीं था.

लोकेश इतना उदास क्यों रहता है, यह हम नहीं जान सके, किंतु उस के कुछ शरारती साथियों ने उस के इस सीधेपन का खूब लाभ उठाया. वे जबतब उसे चिढ़ाते. उस की भाषा पर उस की मैदानी बोली का प्र्रभाव था इसलिए उस के बोलने के लहजे का बच्चे खूब मजाक उड़ाया करते थे.

पर लोकेश बिना कोई प्रतिक्रिया व्यक्त किए चुपचाप उन की फबतियां सुनता रहता. कभीकभी तो बच्चों को इस बात पर भी गुस्सा आता कि वह उन के चिढ़ाने का बुरा क्यों नहीं मानता और उन की बातों का उत्तर क्यों नहीं देता?

लोकेश के पिता मनोरंजन कर अधिकारी थे. किसी कारण दंड के रूप में उन का स्थानांतरण शहर से कसबे में कर दिया गया था. कई वर्ष से एक ही स्थान पर रहने से उन का परिवार ऊब गया था और इस ऊब का असर लोकेश पर भी पड़ा था. उस के पिता तो पहले ही चिड़चिड़े स्वभाव के थे और इस तबादले से तो वे और भी चिड़चिड़े हो गए थे. पहाड़ में मैदान जैसी सुविधाएं नहीं होतीं इसलिए वे बारबार सरकार को कोसते रहते थे. घर में अकसर तनाव का माहौल रहता था. उस तनाव का असर लोकेश पर भी पड़ता था और इसीलिए वह कक्षा में गंभीर बना रहता था.

यह उन दिनों की बात है, जब पहाड़ में पहाड़ी क्षेत्र को अलग राज्य बनाए जाने का आंदोलन चल रहा था. आएदिन हड़ताल, जुलूस, सभा, गोष्ठियां होती रहती थीं. इस आंदोलन के कारण लोगों में पहाड़ी और मैदानी का भेदभाव कूटकूट कर भर गया था. यह भावना बच्चों में भी आ गई थी. वे अकसर अपने मैदानी साथियों को कहते कि जब उत्तराखंड राज्य बनेगा तो तुम्हें तो यहां से भागना पड़ेगा.

आंदोलनकारियों द्वारा अकसर स्कूल बंद करा दिए जाते थे और बच्चों को अध्यापकों सहित जुलूस में शामिल कर लिया जाता था. विद्यालय में पढ़ रहे मैदानी अभिभावकों के बच्चे जुलूस में शामिल होने में अकसर सकुचाते थे. पहाड़ी बच्चे मैदान विरोधी नारे लगाते समय अकसर उन्हें चिढ़ाते.

लोकेश का दूसरे बच्चों के साथ घुलनेमिलने में समय लगने का एक और कारण था, उस का मैदानी होना.

आंदोलन ने जब उग्र रूप ले लिया तो सारे कर्मचारी हड़ताल पर चले गए, महिलाएं तक सड़कों पर उतर आईं. सरकारी स्कूलकालेज बंद करा दिए गए. प्राइवेट स्कूलों को भी जबरदस्ती बंद करा दिया गया.

प्राइवेट स्कूलों में तो जब फीस आती है, तभी अध्यापकों का वेतन निकलता है. एक महीने तक भी हड़ताल नहीं खुली तो हम ने घरघर संपर्क कर चुपकेचुपके विद्यालय लगाने और बच्चों को पढ़ाने का निश्चय किया, लेकिन आंदोलनकारियों को जैसे ही भनक लगती, वे स्कूल बंद कराने आ धमकते. कई सरकारी कर्मचारी भी वेतन मिलना बंद होने के डर से कार्यालय खोल दिया करते थे. ऐसे लोगों को आंदोलनकारी ‘गद्दार’ कहते और एक नारा लगाते थे, ‘गद्दारों की एक दवाई, जूताचप्पल और पिटाई.’

ऐसे चुपकेचुपके काम करने वालों के लिए आंदोलनकारियों ने एक और नुसखा निकाल लिया था. आंदोलनकारी महिला और पुरुष झुंड में जाते और स्कूल या कार्यालय खोलने वाले कर्मचारियों के मुख पर कालिख पोत देते और हाथों में जबरदस्ती चूडि़यां पहना देते. फिर उन लोगों को जुलूस में शामिल कर लेते. इस डर से कई लोगों ने चोरीचोरी काम करना बंद कर दिया.

हम ने विद्यालय बंद नहीं किए और विद्यार्थियों को पढ़ाते रहे. एक दिन आंदोलनकारी कालिख और चूडि़यां लिए हमारे विद्यालय में भी आ धमके. प्रधानाध्यापक मैं ही था और उस समय मैं 8वीं कक्षा को पढ़ा रहा था. आंदोलनकारी कक्षा के बाहर जमा हो गए थे. उन्होंने नारा लगाया, ‘गद्दारों की दवाई…’ और लोगों ने नारे को पूरा किया.

उन में से एक चिल्लाया, ‘‘इस को बाहर खींचो.’’

सारे बच्चे सहम गए. मैं भी था. उन में से एक आदमी कक्षा में घुस आया और बोला, ‘‘जब सब जगह हड़ताल है तो तुम कैसे स्कूल खोले हुए हो? गद्दार,’’ उस ने कहा और मेरा हाथ पकड़ लिया. इतने में एक और व्यक्ति भीतर आ गया. उस के हाथ रंगे हुए थे.

वह मुझे छूता इस से पहले ही लोकेश अपने स्थान पर खड़ा हो गया और चिल्लाया, ‘‘ठहरो, अगर किसी ने प्राचार्य को हाथ लगाया तो ठीक नहीं होगा,’’ फिर तुरंत अपनी सीट से उठ कर मेरे सामने खड़ा हो गया और बोला, ‘‘हमारे प्राचार्य हमें पढ़ा कर कौन सा अपराध कर रहे हैं? हड़ताल को 4 महीने हो गए हैं क्या हमारी पढ़ाई का हर्जाना आप लोग पूरा करेंगे? हमारे बदले परीक्षा देने आप लोग जाएंगे क्या?

‘‘आंदोलन का यह कौन सा तरीका है कि पढ़ाई को नुकसान पहुंचाओ. ऊपर से अध्यापकों का अपमान? क्या हम सभाओं में नहीं आते? क्या हम जुलूस में सम्मिलित नहीं होते? फिर आप हमारी पढ़ाई का नुकसान करने पर क्यों तुले हुए हैं? क्या आप के बच्चे नहीं हैं आप को अच्छा लगता है कि आप के बच्चे घर पर बैठे रहें?’’ थोड़ी देर रुकने के बाद लोकेश फिर बोला, ‘‘आप दूसरे लोगों के साथ जो इच्छा हो, व्यवहार करें. किंतु यहां हमारे आचार्यों के साथ कुछ भी अनुचित हुआ तो हम से बुरा कोई नहीं होगा.’’

लोकेश ने आंदोलनकारी से मेरा हाथ छुड़ा लिया. फिर अपने साथियों की ओर मुड़ कर बोला, ‘‘हम सब एक हैं. बोलो, छात्र एकता…’’ सारे बच्चों ने उत्तर दिया, ‘‘जिंदाबाद.’’

आंदोलनकारियों की उस के बाद कुछ करने की हिम्मत नहीं हुई. वे चुपचाप वहां से खिसक लिए. मैं सचमुच भयभीत हो गया था और कांपने लगा था. लोकेश के साहस को देख कर मेरे आंसू छलक पड़े. मैं ने उसे गले लगा लिया. उस दिन से वह सभी छात्रों का मित्र ही नहीं, नेता भी बन गया.






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