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दिशाहीन होते किशोर

संपादकीय

आज का किशोर यानी कल का वयस्क दिशाहीन हो रहा है. ठीक है मानसूनी बादल कब कहां कितने बरसेंगे मालूम नहीं रहता पर बरसेंगे तो सही, यह पक्का रहता है पर आज हमारे किशोरों को नहीं मालूम कि कल क्या होगा. इस के जिम्मेदार किशोर नहीं हैं, वे नेता हैं जो अपना राग अलापते रहते हैं, वे अफसर हैं जो मेज थपथपाते रहते हैं, वे मुल्लापंडे हैं जो घंटेघडि़याल खड़काते रहते हैं, शिक्षा के दुकानदार हैं जो सारा समय पैसा सिर्फ पैसा कमाते रहते हैं.

कल के युवाओं, आज के किशोरों को सही जमीन न देने की गलती आज के वयस्क, नीति निर्धारक कर रहे हैं और अफसोस यह है कि उन के कुकर्मों की सजा अगली पीढ़ी भुगतेगी. चीन की पिछली पीढ़ी ने मेहनत की, अगले कल की सोची और 1960 तक दुनिया का सब से गरीब देश आज सब से ज्यादा फैलने वाला देश बन गया है. चीनी युवाओं की कर्मठता है कि वे अफ्रीका, बंगलादेश, पाकिस्तान, थाईलैंड, म्यांमार में ही नहीं पूर्वी यूरोप के देशों में सड़कें, पुल, बांध, रेलें, स्टेडियम बना रहे हैं.

ठीक है बोलने की आजादी चीन में नहीं है पर

भई, भारत में भगवा गमछाधारियों ने कौन से हमारे लिए  यहां छोड़ी है. हमारे किशोरों तक को या तो उन्होंने अपनी भाषा बोलने वाला तोता बना दिया या पुलिस भेज कर विरोध करने वालों को डरा दिया.

समाज का निर्माण नई सोच से होता है जो समाज सदियों से गोबर और गंद के गड्ढे में फंसा हो, उसे जिस नए पल की तलाश है वह किशोरों के मन में पैदा होती है पर हम ने उन किशोरों को या फिर तो मोबाइल पकड़ा दिए या मौजमस्ती की राह दिखा दी. स्कूलों में अब वादविवाद प्रतियोगिताएं नहीं होतीं, स्पैलिंग बी (मधुमक्खी) जैसी निरर्थक प्रतियोगिता ज्ञान के नाम पर होती हैं.

किशोरों को औब्जैक्टिव परीक्षा के नाम पर अपनी बात कहने की आदत सुधारने से हटा दिया है. अब उन्हें सिर्फ हां या न कहना आता है, बुलैट प्वाइंट से अपनी बात समझाने का पाठ पढ़ा डाला. झंडे फहराने से काम नहीं चलता, न ही जस्टिन बीबर की म्यूजिकल इवनिंग में थिरकने से कुछ बनता है.

किशोरों को नई हवा का आनंद लेने दें. हर बारिश, हर मानसून एक नई उमंग ले कर आता है. उस की भीनी सुगंध का आनंद हो, बारिश का पानी सीवर के पानी में मिल कर सड़ांध न मारे यह देखना जरूरी है.






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