Main Menu

जासूस राजकुमारी नूर इनायत खान

जासूस महिलाओं के किस्सों से इतिहास भरा पड़ा है. हम बात कर रहे हैं एक ऐसी जासूस महिला की जो भारतीय मूल की थी,  जिसने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अचानक जासूस बनने का फैसला लिया. आज उसके बलिदान और साहस की गाथा ब्रिटेन और फ्रांस में खूब गाई जाती हैं. इस महिला का नाम था नूर इनायत खान

दुनिया के आधुनिक इतिहास में एडोल्फ हिटलर एक ऐसा नाम है जिसका नाम सुनते ही आज भी लोगों के रोंगटे ख़डे हो जाते हैं. लोग द्वितीय विश्व की युद्ध की सिर्फ कल्पना कर सकते हैं पर कभी यह नही सोच सकते कि हिटलर की नाजी सेना के खिलाफ जासूसी का काम किया जा सकता है. लेकिन भारतीय मूल की महिला जासूस नूर इनायत खान ने फ्रांस में ब्रिटेन की तरफ से हिटलर के खिलाफ न सिर्फ जासूसी की थी बल्कि उसकी सेना की नाक में दम कर दिया था. नूर को फ्रांस में उसके द्वारा किए गए काम तथा 10 महीने तक चली यातनाओं के बावजूद कोई भी राज नहीं उगला. मरणोपरांत उन्हें जॉर्ज क्रॉस से सम्मानित किया गया था.

नूर मैसूर के महान शासक टीपू सुल्तान के राजवंश की राजकुमारी थीं. बेहद खूबसूरत और मासूमियत से भरा चेहरा, आंखों में गहराई, वीणा पर थिरकती उंगलियां और रुह तक सीधे पहुंचने वाले सूफियाना कलाम के सरीले बोल…ये सब नूर इनायत खान के व्यक्तित्व का कभी हिस्सा हुआ करता थे. लेकिन नाजियों की तानाशाही नीति और द्वितीय विश्व युद्ध के शुरु होने की घटना ने इस राजकुमारी को अंदर तक झकझोर दिया था. यहीं से उसकी जिंदगी बदल गई और वह विश्व की एक जांबाज जासूस बन गई. सबसे हैरत की बात है कि वह ब्रिटेन की साम्राज्यवादी नीति की विरोधी होने के बावजूद भी उनके लिए लड़ी.

नूर के पिता इनायत खान ही वह व्यक्ति थे जिन्होंने पश्चिमी देशों में इस्लाम की सूफी धारा का प्रचार किया था. उनके पश्चिमी देशों के भ्रमण के दौरान ही उनकी मुलाकात एक अमेरिकी महिला से हुई. बाद में दोनों नजदीक आए और शादी कर ली. नूर इनकी चौथी संतान थी. देश से दूर रहते हुए भी नूर के पिता ने भारतीय संस्कार को बनाए रखने के लिए पेरिस के बाहर अपना घर बना रखा था.

नूर इनायत का जन्म 1 जनवरी 1914 को मॉस्को में हुआ था. नूर के पिता धार्मिक शिक्षक थे, जो परिवार के साथ पहले लंदन और फिर पेरिस में बस गए थे. वहीं नूर की पढ़ाई हुई और उन्होंने कहानियां लिखना शुरु किया. पहले विश्व युद्ध के बाद नूर का परिवार लंदन चला गया था. यहां पर कुछ दिनों बाद इनके पिता की मौत हो गई और उनपर घर की जिम्मेदारी आ गई. तब नूर ने संगीत को ही अपने जीवन यापन का साधन बनाया. फ्रेंच भाषा में निपुणता होने के कारण वह फ्रेंच रेडियो में भी अपना योगदान देने लगीं.

अपने पिता के शांतिवादी शिक्षाओं से प्रभावित नूर को नाजियों अत्याचार से गहरा सदमा लगा. जब फ्रांस पर जर्मनी ने हमला कर दिया तो उनके दिमाग में उसके खिलाफ वैचारिक उबाल आ गया. उन्होंने अपने भाई विलायत के साथ मिलकर नाजी अत्याचार को कुचलने का निर्णय लिया. 19 नवंबर 1940 को वह वायु सेना में द्वितीय  श्रेणी एयरक्राफ्ट अधिकारी के रुप में शामिल हुईं, जहां उन्हें वायरलेस ऑपरेटर के रुप में प्रशिक्षण हेतु भेजा गया. उनका कोड नाम मेडेलिन रखा गया. वे भेष बदलकर अलग-अलग जगह से संदेश भेजती रहीं. जून 1941 में उन्होंने आरएएफ बॉम्बर कमान के बॉम्बर प्रशिक्षण स्कूल में आयोग के समक्ष सशस्त्र बल अधिकारी के लिए आवेदन किया, जहां उन्हें सहायक अनुभाग अधिकारी के रुप में पदोन्नति प्राप्त हुई.

इस दौरान नूर के साथ भेजे सभी ब्रितानी जासूसों को नाजियों के हाथों मौत का शिकार होना पड़ा था. इन सबके बावजूद भी नूर ने पीछे हटना स्वीकार नहीं किया. फ्रांस में नूर इकलौती ऐसी महिला थीं जो ब्रिटेन के लिए काम कर रही थी. वह नाजियों की मोस्ट वांटेड लिस्ट में शामिल हो गई थीं. काफी लुका छिपी के बाद जर्मन खुफिया विभाग ने पेरिस में 13 अक्टूबर 1943 में गिरफ्तार कर लिया. 25 नवंबर 1943 को नूर इनायत खान एसओई एजेंट जॉन रेनशॉ और लियॉन के साथ सिचरहिट्स डिन्ट्स (एसडी) पेरिस के हेडक्वार्टर से भाग निकली, लेकिन वह ज्यादा दूर तक नहीं भाग सकीं और उन्हें फिर से गिरफ्तार कर लिया गया.

बात 27 नवंबर 1943 की है. अब नूर को पेरिस से जर्मनी ले जाया गया. नवंबर 1943 में उन्हें जर्मनी के फार्जेज्म जेल भेजा गया. इस दौरान भी अधिकारियों ने उनसे खूब पूछताछ की, लेकिन उसने कुछ नहीं बताया. उन्हें दस महीने तक बेदर्दी से जंजीरों में बांधकर टॉर्चर किया गया, फिर भी उन्होंने अपनी जुबान नहीं खोली. 11 सितंबर 1944 को उन्हें और उसके तीन साथियों को जर्मनी के डकाऊ प्रताड़ना कैंप ले जाया गया, जहां 13 सितंबर 1944 की सुबह चारों के सिर पर गोली मारने का आदेश सुनाया गया. हालांकि सबसे पहले नूर को छोड़कर उनके तीन साथियों के सिर पर गोली मार कर हत्या की गई. तत्पश्चात नूर को डराया गया कि वह सब कुछ बता दें, पर कुछ नहीं बताने पर उनके भी सिर पर गोली मारकर हत्या कर दी गई. इसके बाद सभी को शवदाहगृह में दफना दिया गया. नूर वास्तव में एक मजबूत और बहादुर महिला थीं. उस समय नूर की उम्र सिर्फ 30 साल थी. उन्होंने आखिरी दम तक अपना राज नहीं खोला. जब उन्हें गोली मारी गई, तो उनके होठों पर शब्द था -फ्रीडम यानी आजादी. इस उम्र में इतनी बहादुरी कि जर्मन सैनिक तमाम कोशिशों के बावजूद उनसे कुछ भी नहीं जान पाए, यहां तक कि उनका असली नाम भी नहीं। जर्मनी में डचाऊ में नाजियों का यह यातना कैंप, जहां नूर को गोली मारी गई थी, के बलिदान की अहमियत को इसी बात से पता चलता है कि ब्रिटेन की डाक सेवा ने उनके डाक टिकट जारी किए. ब्रिटेन की सरकार ने 2012 में नूर के बलिदान को सम्मान देते हुए लंदन में उनकी प्रतिमा स्थापित करवाई जहां वह बचपन में रहा करती थी. प्रतिमा का अनावरण ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ की बेटी ऐन किया था. ब्रिटिश सरकार ने नूर इनायत खान को अपना सर्वोच्च नागरिक सम्मान जॉर्ज क्रॉस दिया. साथ ही फ्रांस सरकार ने भी अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान क्रोक्स डी गेयर से उन्हें सम्मानित किया.

कौन थी वह बहादुर महिला?

नूर 18वीं सदी में मैसूर के राजा टीपू सुल्तान की वशंज थीं. ब्रितानी साम्राज्य की विरोधी होने के बावजूद नूर ने ब्रिटेन के लिए जासूसी की और एक नई मिसाल कायम की. नूर की पृष्ठभूमि ऐतिहासिक और बेहद दिलचस्प रही है. वह हजरत इनायत खान की बड़ी बेटी थीं. हजरत इनायत खान वही शख्स थे, जिन्होंने भारत के सूफीवाद को पश्चिमी देशों तक पहुंचाया था.

पकड़े जाने पर भी कुछ नहीं बताया

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नूर इनायत खान विंस्टन चर्चिल के विश्वसनीय लोगों में से एक थीं. उन्हें सीक्रेट एजेंट बनाकर नाजियों के कब्जे वाले फ्रांस में भेजा गया था. नूर इनायत ने पेरिस में तीन महीने से ज्यादा वक्त तक सफलतापूर्वक अपना खुफिया नेटवर्क चलाया और नाजियों की जानकारी ब्रिटेन तक पहुंचाई. पेरिस में 13 अक्टूबर,  1943  को एक कामरेड की गर्लफ्रेंड ने जलन के मारे उनकी मुखबिरी की और वे पकड़ी गई,  उन्हें जासूसी करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया. 25 नवंबर, 1943  को इनायत एसओई एजेंट जॉन रेनशॉ और लियॉन के साथ पेरिस के हेडक्वार्टर से भाग निकलीं,  लेकिन वे ज्यादा दूर तक भाग नहीं सकीं और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. 27 नवंबर, 1943 को नूर को पेरिस से जर्मनी ले जाया गया. नवंबर 1943 में उन्हें जर्मनी के फॉर्जेम जेल भेजा गया. इस दौरान भी अधिकारियों ने उनसे खूब पूछताछ की, लेकिन उसने कुछ नहीं बताया.

बॉक्स….नूर का जासूसी सफर

नूर जब छोटी थी, तब वह अपने परिवार के साथ इंग्लैंड चली गई,  वहां रहते हुए नूर ने एयरफोर्स के महिला सहायक का दल ज्वाइन किया. फ्रेंच की अच्छी जानकारी और बोलने की क्षमता से नूर ने स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया. फिर वह बतौर जासूस काम करने के लिए तैयार हो गई. जून 1943 में उन्हें जासूसी के लिए रेडियो ऑपरेटर बनाकर फ्रांस भेज दिया गया था. उनका कोड नाम ‘मेडेलिन’ रखा गया था. वे भेष बदलकर अलग-अलग जगह से संदेश भेजती रहीं.  उन्होंने दो अन्य महिलाओं डायना राउडेन (पादरी कोड नाम) और सेसीली लेफ़ोर्ट (ऐलिस शिक्षक/कोड नाम) के साथ फ्रांस की यात्रा की, जहां वे फ्रांसिस सुततील (प्रोस्पर कोड नाम) के नेतृत्व में एक नर्स के रूप में चिकित्सकीय नेटवर्क में शामिल हो गई.

 






Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *