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गढ़ने होंगे शिक्षा के नये सिद्धांत

शायद आप इन दोनों के ही उत्तर ठीक से नहीं दे पाएंगे. क्योंकि 10वीं का सर्टिफिकेट आपकी डेट ऑफ बर्थ का प्रमाण बनकर रह गया है और ग्रेजुएशन की पढ़ाई के दौरान पढ़े गए अध्याय सिर्फ आपकी नौकरी हासिल करने में मदद कर रहे हैं।

अगर प्रोफेशनल कोर्स जैसे एमबीबीएस, इंजीनियरिंग, बीएड, सेना से जुड़े कोर्स और ऐसे ही कुछ और प्रोफेशनल कोर्स को अगर छोड़ दें तो देश की साधारण शिक्षा व्यवस्था महज हमारे समाज के छात्रों को कोल्हू के बैल की तरह एक ही धूरी पर घुमाती रहती है तब तक कि जब तक वो युवा नहीं हो जाता।

इस बात को समझने के लिए हमें भारतीय शिक्षा व्यवस्था को पहले समझना होगा. शुरुआत करते हैं मैकाले के शिक्षा के मॉडल से. मैकाले ने देश में जो अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था को लागू किया उसके तहत विज्ञान और अर्थशास्त्र की पढ़ाई के साथ कला यानी आर्ट के छात्रों को सामाजिक ज्ञान, इतिहास और व्यवहारिक ज्ञान देना तो तय किया ही गया था साथ ही एक हिस्सा क्रिश्चयनिटी का भी परोस दिया गया था. जिसमें अंग्रेजी साहित्य और इतिहास के साथ-साथ क्रिश्चयन फिलोशॉफी का समावेश भी देखने को मिला. कुल मिलाकर ये एक ऐसी प्रक्रिया थी जिसमें भारतीय मानस को लगातार 20 से 25 साल तक एक ही धुरी पर घुमाना था. ताकि इस बीच भारतीय मानस की युवा शक्ति या तो क्षीण हो जाए या इतनी परिपक्व हो जाए कि वो धरातल पर काम ही नहीं कर पाए।

ठीक इसी तरह से विज्ञान और अर्थशास्त्र के क्षेत्र में भी किया गया. मैकाले की शिक्षा व्यवस्था में वैसे तो कोई समस्या नहीं है क्योंकि ये सिस्टम तो आजतक लागू है. लेकिन सवाल ये उठता है कि जब ये सिस्टम इतना ही अच्छा है तो सिस्टम से अभी तक पूरा देश साक्षर क्यों नहीं हुआ. इस सिस्टम के तहत हम शिक्षा के क्षेत्र में अभी तक मात क्यों खा रहे हैं. क्यों हमारे देश का युवा शिक्षित होने के बावजूद भी बेरोजगार है।

हाल की बात करें तो देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2014 में स्किल इंडिया की नींव रखी थी और उन्होंने अपने भाषण में भी कहा कि शिक्षित होने के साथ-साथ हमारे देश के छात्रों को व्यवहारिक तौर पर भी मजबूत होना चाहिए. उनका इशारा बेशक इस ओर है कि अब समय आ गया है जब हमें शिक्षित होने के साथ-साथ व्यवहारिक भी होना होगा. यहां व्यवहारिक होने से तात्पर्य है प्रोफेशनली मजबूत. यानी हमें हमारे देश के छात्रों के लिए एक ऐसी शिक्षा प्रणाली की रुपरेखा गढ़नी होगी जो उन्हें शिक्षित करने के साथ-साथ उनके हाथ भी मजबूत कर सके।

इस बात को समझने के लिए हमें भारतीय दर्शन और इतिहास को समझना होगा. भारतीय दर्शन और इतिहास में विष्णु दत्त शर्मा रचित पंचतंत्र का उल्लेख मिलता है. इस पंचतंत्र में विष्णु दत्त शर्मा एक राजा के चार मूर्ख पुत्रों को छोटी उम्र में शिक्षित कर बुद्धिमान बना देता है और आज भी हम अपने बच्चों को पंचतंत्र इसलिए ही पढ़ने के लिए देते हैं कि हमारे बच्चे उस किताब से सामाजिक व्यवसायिक और शासन प्रणाली को आसानी से समझ जाएं. पंचतंत्र के हिसाब से शिक्षित होने के लिए 4 साल की उम्र से लेकर 14 साल की आयु काफी है. उसके बाद व्यक्ति के व्यक्तित्व के आधार पर उसे व्यवहारिक शिक्षा का ज्ञान देना चाहिए. यानी 14 साल से लेकर 16 के बीच उसे व्यवहारिक शिक्षा का ज्ञान हो जाना चाहिए और 18 साल तक किसी योग्य गुरु के सानिध्य में प्रैक्टिस कर 19 साल की आयु से जिस काम में छात्र ने पारंगता हासिल की है उसे मुक्त रुप से आरंभ कर देना चाहिए. यानी 18 साल की आयु तक उसे अपने क्षेत्र का मास्टर हो जाना चाहिए।

लेकिन मैकाले के सिस्टम के हिसाब से हमें 5 साल से शिक्षा के मंदिर में प्रवेश करना चाहिए और 12 साल पढ़ाई करने के बाद 3 साल स्नातक और 2 साल परास्नातक उसके बाद रिसर्च और उसके बाद फिर अपने कार्य क्षेत्र में कार्य करना चाहिए. इस हिसाब से छात्र सिर्फ शिक्षित होने के लिए ही 17 साल अपने लगा देता है. इसके बाद 7 साल और अध्ययन करने के बाद, जिसमें वो पीएचडी तक पहुंचता है, खर्च करता है. यानी वह लगभग 30 साल की आयु तक शिक्षा हासिल करता है।

इस हिसाब से देखे तो मैकाले की शिक्षा व्यवस्था के तहत हम आधा जीवन सिर्फ शिक्षित होते हैं और व्यवहारिक ज्ञान हासिल करने के लिए अलग से ट्रेनिंग लेते हैं. शायद यही वजह है कि देश के प्रधानमंत्री बार-बार शिक्षा के साथ-साथ कौशल विकास की बात करते हैं. अब चूंकि समय बदल रहा है और सामाजिक तौर पर हमें हर हाल में मजबूत होना है. ऐसे में यह तय करना बेहद आवश्यक है कि अब आने वाले समय में हमें कैसी शिक्षा व्यवस्था की आवश्यकता है और हमें अपने छात्रों को किस तरह से शिक्षित करना है।

हमें नये सिरे से सोचना होगा कि हमें कौन से भारत का निर्माण करना है जिसके युवा उम्रदराज, थके हुए और आलसी हो या हमें उस भारत की नींव रखनी हो जिसमें युवा शिक्षित, ऊर्जावान हों.






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