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खतरनाक है टीवी पर योगा सीखना

अपनी शारीरिक क्षमता ,मानसिक स्थिति और समय की उपलब्धता के अनुसार ही विधिवत योग सीखना लाभकारी होता है. योग में शरीर और मन दोनों का बहुत महत्व है। इसमें आसनों की मुद्रा के साथ ,सांस लेने, बाहर निकालने का भी नियम होता है. अगर कोई किसी बीमारी से ग्रस्त हैं, तो योग साधक या ट्रेनर उस व्यक्ति को,  कुछ आसनों को करने से मना कर देते हैं या उनका कोई असान रूप बता देते हैं. ऐसा इसलिए किया जाता है ,ताकि बीमारी न बढ़े. ना हीं व्यक्ति किसी दूसरी बीमारी का शिकार हो. अगर कोई व्यक्ति रीढ़ के दर्द से परेशान है, या घुटनों में दर्द है तो सलाह दी जाती है,कि ऊंची और मुलायम जगह पर योग करें. ताकि सीधे ज़मीन से उठने पर, होनेवाली परेशानियों से बचा जा सके। इसी तरह घुटने में दर्द होने पर आलथी-पालथी मारना या पद्मासन करना मना होता है. फिर कितनी देर योग अभ्यास किया जाए यह भी शारीरिक क्षमता और समय की उपलब्धि पर निर्भर करता है. ऐसा करना उचित नहीं कि आप 2 मिनट नूडल्स या फास्टफूड की तरह वह भी जल्दी-जल्दी करें और कान पर मोबाइल लगाए गंतव्य की ओर दौड़ जाएं।

टीवी पर योगीराज अपना ढीला ढाला पजामा संभालते हुए, पीठ के दर्द से संबंधित अनेक आसनों को अधूरे ढंग से बता रहे थे. पजामे की वजह से उचित ढंग से करने की कोई गुंजाइश नहीं थी और 2 मिनट में सात आठ ,आसन बता देना कोई साधारण काम भी नहीं है. जिस रफ्तार से बोल रहे थे उसकी दुगनी रफ़्तार से कर रहे थे. 2 मिनट में सारा ज्ञान उड़ेल कर चुपचाप बैठ गए. घुटने के दर्द वाले को अगर घुटनों पर बल लगाना पड़ जाए; तो क्या होगा इसे समझने के लिए रॉकेट साइंस को जानना जरुरी नहीं। इसका कोई असान रूप हो सकता है. पर यह टीवी के सामने बैठकर सीखने करने से तो पता नहीं चलेगा, इसके लिए किसी जानकार से गहराई से बात करने पर ही पता चलेगा। आपका शरीर है आप उसे बेहतर जानते हैं।

इस दौरान कई बार सलाह लेने की जरुरत भी पड़ती है। टीवी के ऐसे कार्यक्रम हमें प्रेरणा देने के लिए हैं ना कि बिना सोचे समझे पालन के लिए. जब हम अपनी बीमारी के इलाज के लिए योग्य डॉक्टर तलाशते हैं, तो योग भी  विधिवत सीखना चाहिए। अपने शरीर और मन से भी राब्ता कायम करें. जान लीजिए कि 2 मिनट नूडल्स की तरह ही है टीवी पर 2 मिनट योगा सीखना।






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