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एलियंस एक अनसुलझी पहेली

हम इंसानों की दिलचस्पी खुद से ज्यादा इसमें रहती है कि उन्हें किसी तरह यह पता चल जाए कि इस ब्रह्मांड में कहीं और जीवन या एलियंस हैं या नहीं, इसके लिए कई वैज्ञानिक प्रयोग चल रहे हैं तो कहींकहीं बेहद अजीबो-गरीब तरीके अपनाए जा रहे हैं। साल 2017 के अगस्त माह में खबर आई कि अमेरिकी स्पेस एजेंसी- नासा ने दुनिया को दूसरे ग्रहों के निवासियों यानी एलियंस के हमले से बचाने के लिए ब्रह्मांड के रक्षक के रूप में प्लैनेटरी प्रोटेक्शन ऑफिसर की वैकेंसी निकाली है। नासा ने स्पष्ट किया कि प्लैनेटरी प्रोटेक्शन ऑफिसर का काम धरती को एलियंस के हमलों से बचाना होगा और इसके लिए चयनित व्यक्ति को कई सुविधाओं के साथ जो वेतन दिया जाएगा, वह सालाना 80 लाख से 1.20 करोड़ रुपये के बराबर होगा। ऐसे व्यक्ति को नासा के साथ तीन से पांच साल के अनुबंध में बंधना होगा। नासा में निकले इस पद को लेकर लग सकता है कि कहीं यह कोई मजाक तो नहीं, पर ऐसा नहीं है। नासा का मत है कि, एलियंस यानी परग्रही प्राणी हो सकते हैं, हमें सिर्फ उनकी जानकारी नहीं है। नासा की गंभीरता का एक पक्ष यह भी है कि इस साल नवंबर, 2017 से यह संस्था धरती को बाहरी खतरों से बचाने के संबंध में एक नया पाठ्यक्रम- प्लैनेटरी प्रोटेक्शन कोर्स भी शुरू करने जा रही है। इसमें केवल 15 सीटें होंगी,  इसके लिए मैनेजर, इंजीनियर, साइंटिस्ट कोई भी आवेदन कर सकता है।


धरती से बाहर कहीं जीवन हो सकता है, इसे लेकर सिर्फ नासा की कोशिशें ही उल्लेखनीय नहीं है बल्कि अपने देश में भी इसे लेकर कई सवाल उठ चुके हैं। पिछले साल (2016) सितंबर में सरकार के गृह मंत्रालय से आरटीआई के तहत जानकारी मांगी गई थी कि अगर देश पर एलियंस और जॉम्बीज का हमला होता है तो उससे निपटने के लिए सरकार की क्या तैयारी है? आरटीआई में कई और सवाल भी थे, जैसे इसमें यह भी पूछा गया था कि, क्या ऐसे हमलों के वक्त हॉलीवुड स्टार विल स्मिथ की मदद लिए बिना देश को बचाया जा सकता है? इसी तरह एलियंस और जॉम्बीज के हमले से आम जनता को बचाने के लिए सरकार के पास क्या योजनाएं हैं? अगर कोई युद्ध बाहरी सभ्यताओं से होता है तो इस संभावित जंग में हमारे बचने की संभावना कितनी है? इस आरटीआई को गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू ने अपने ट्विटर अकाउंट पर पोस्ट किया और लिखा, सरकार के अफसरों का वक्त न बर्बाद करें. रिजिजू ने लिखा- इस आरटीआई की सामग्री बहुत साइंटिफिक है, लेकिन इस तरह की आरटीआई से मंत्रालय के स्टाफ का कीमती वक्त बर्बाद होता है।

क्या चांद पर एलियन हैं:-
कुछ साल पहले ऐसी ही चर्चा अमेरिका में डॉक्यूमेंट्री फिल्म अपोलो 11 द अनटोल्ड स्टोरी से शुरू हुई थी. इस डॉक्यूमेंट्री फिल्म में चंद्रमा पर बुद्धिमान प्राणी कहे जाने वाले एलियंस की उपस्थिति के दावों की पड़ताल की गई थी। डॉक्यूमेंट्री फिल्म में चंद्रमा पर पांव रखने वाले दूसरे इंसान एडविन आल्ड्रिन को यह कहते हुए दिखाया गया है कि उन्होंने अमेरिकी स्पेस एजेंसी- नासा को चंद्रमा पर मौजूद एलियंस के बारे में बताया था, पर नासा ने उस मामले को दबा दिया। 21 जुलाई, 1969 को जब अपोलो-11 यान चंद्रमा पर उतरने ही वाला था, तो टीवी ट्रांसमिशन के जरिए उनमें से एक अंतरिक्ष यात्री में चंद्रमा के एक गड्ढे में असाधारण चमक देखने की बात कही थी। जब पृथ्वी पर तैनात मिशन कंट्रोलर ने उनसे इस बारे में कुछ और स्पष्ट करने को कहा था। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी- नासा के एक पूर्व कर्मचारी ओटो बाइंडर ने दावा किया कि उन्होंने वेरी हाई फ्रीञ्चवेंसी रिसीवर से नासा के अधिकारियों और चंद्रयात्रियों की बातचीत को पकड़ा था, जिसमें एक चंद्रयात्री ने कहा था कि ये बेबीज (अंतरिक्षीय प्राणी) बड़े विशाल हैं।

इस घटना के बारे में नासा के वरिष्ठ वैज्ञानिक ने नील आर्मस्ट्रांग से भी पूछताछ की थी. दावा किया जाता है कि उस बातचीत में आर्मस्ट्रांग ने स्वीकार किया था कि उन अंतरिक्षीय प्राणियों के यान तकनीकी और आकार के लिहाज से काफी बड़े और उन्नत थे। वैज्ञानिक व्लादिमीर अझाझा के अनुसार नील आर्मस्ट्रांग ने ही वह संदेश मिशन कंट्रोल को भेजा था, जिसमें उन्होंने दो रहस्यमयी तथा अत्यंत विशाल यानों की चंद्रमा पर मौजूदगी की बात कही थी. लेकिन यह संदेश नासा ने सेंसर कर दिया और कभी सार्वजनिक नहीं किया, ताकि पृथ्वी पर इससे कोई भय नहीं फैले.
एक अन्य वैज्ञानिक अलेक्जेंडर कैसेंट्सलेव के मुताबिक एडविन आल्ड्रिन ने तो चंद्रमा पर मौजूद यूएफओ के अंदर जाकर रंगीन फिल्म उतारी थी. यह भी कहा जाता है कि कुछ समय पहले एडविन आल्ड्रिन ने चंद्रमा से नासा को भेजे अपने संदेश के कुछ हिस्से का खुलासा किया था. इसमें संदेश कुछ इस तरह था यहां यान से बाहर कुछ है. वह इतने करीब है कि हम उसकी पड़ताल कर सकते हैं. वह हमारे यान से कुछ दूरी पर विचरण कर रहा है, पर हम नहीं जानते कि वह क्या है. हालांकि यह पूरी डॉक्यूमेंट्री फिल्म इस तथ्य पर केंद्रित थी कि सोवियत संघ को पछाडऩे के लिए कितनी कम तैयारियों के साथ आनन फानन में यह चंद्रयात्रा की गई थी और इसमें इतना खतरा था कि यान के पृथ्वी पर पहुंचने के वक्त उसमें सिर्फ 15 सेकेंड का ईंधन और शेष था. सिर्फ यही नहीं, उस वक्त अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने राष्ट्र के नाम यह संबोधन देने के लिए भी तैयार थे कि चंद्रमा पर गए तीनों अंतरिक्ष यात्री- नील आर्मस्ट्रांग, एडविन आल्ड्रिन और माइकल कॉलिंस अपने स्पेस मिशन में मारे गए, पर दैव योग से यह यात्रा सफल रही और अमेरिका एक इतिहास रचने में सफल हुआ।

क्या एलियंस का कोई वजूद है ?
चंद्रयात्रियों के कथित दावों और अब नासा में निकली नौकरी के विज्ञापन के मद्देजनर यह चर्चा तो छिड़ ही गई है कि क्या ब्रह्मांड में एलियंस की मौजदूगी है। वैसे तो बीते कई दशकों में एलियंस की खोज कहीं नहीं पहुंची है और लाखों करोड़ों डॉलर के खर्च और तमाम दावों अभियानों की नाकामी के बाद भी कोई ‘जादू’ घटित होता नहीं दिखाई दिया है, लेकिन ब्रिटिश अंतरिक्ष विज्ञानी व भौतिकशास्त्री प्रोफेसर स्टीवन हॉकिंग इस सोच के समर्थक हैं कि ब्रह्मांड में कहीं न कहीं इंसानों जैसी या उससे भी ज्यादा बुद्धिमान सभ्यता मौजूद है। चूंकि यह ब्रह्मांड बहुत विशाल है, उसके अंतहीन कोनों में हमारी पहुंच बहुत सीमित है और शायद एलियंस ने अपनी ओर से कोई ऐसा संदेश हमें नहीं भेजा है जिसे सुना या देखा जा सके, इसलिए उनकी उपस्थिति दर्ज नहीं की जा सकी है।

 

यही वजह है कि प्रो. हॉकिंग इस खोज में नए सिरे से और पूरी ताकत से जुटे हुए हैं। इसके लिए उन्होंने पैसे की कोई कमी नहीं छोड़ी है। इसके लिए वर्ष 2015 में उन्होंने 10 करोड़ डॉलर के खर्च से चलने वाली परियोजना ‘द ब्रेकथ्रू लिसेन’ की शुरुआत की थी। सात साल पहले वर्ष 2010 में एक टेलीविजन चैनल (डिस्कवरी) पर प्रसारित की गई एक सीरीज में स्टीवन हॉकिंग ने कहा था कि अन्य ग्रहों पर भी बुद्धिमान प्राणी हो सकते हैं और संभव है कि वो संसाधनों की तलाश में पृथ्वी पर हमला करें। उन्होंने यह भी कहा था कि अगर एलियन पृथ्वी पर आते हैं तो उसका वैसा ही परिणाम होगा, जैसा कोलबंस के अमेरिका पहुंचने पर वहां के मूलनिवासियों का हुआ था। यानी अमेरिका के संसाधनों पर दूसरे इलाके के लोगों का कब्जा हो गया था। हालांकि उस वक्त प्रो. हॉकिंग ने यह भी कहा था कि एलियंस यानि दूसरे ग्रहों के प्राणियों से संपर्क करने की कोशिश करने से बेहतर यह होगा कि हम उनसे बचें।

अब तक के अभियान
एलियंस की खोज पिछले कई दशकों से चल रही है. माया सभ्यता के कई रेखांकन बाह्य अंतरिक्ष की सभ्यताओं के संकेत देते हैं. पर एलियंस हो सकते हैं और वे हम पृथ्वीवासियों से संपर्क कर सकते हैं- इस अवधारणा को ज्यादा बल सितंबर, 1959 में मिला था। साइंस मैगजीन- नेचर में प्रकाशित एक लेख में कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के दो भौतिकविदों ने दावा किया था कि ब्रह्मांड से अति उन्नत सभ्यताएं इलेक्ट्रो मैग्नेटिक तरंगों के जरिए पृथ्वी पर संदेश भेज रहे हैं। ऐसे संदेशों से वे हमसे संपर्क करने की कोशिश में हैं, इस अवधारणा ने अमेरिका में सेटी (सर्चफॉर एक्स्ट्रा टेरस्ट्रियल इंटेलीजेंस) अभियान के तौर-तरीकों की एक रूपरेखा बनाई थी। इसके बाद 1965 में जब अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा का यान ‘मार्निर-4’ मंगल के करीब पहुंचने वाला पहला अंतरिक्ष यान बना और उसने मंगल की तस्वीरें पृथ्वी पर भेजीं, तो दूसरे ग्रहों पर जीवन होने की संभावनाओं कल्पनाओं को जैसे नए पंख मिल गए। आज भी परग्रही सभ्यता अथवा ब्रह्मांड में कहीं और जीवन के सूत्र तलाशने के लिए मंगल वैज्ञानिकों का सबसे पसंदीदा ठिकाना है। फिलहाल पांच ऑर्बिटर मंगल की परिक्रमा कर रहे हैं और क्यूरोसिटी नामक रोवर उसकी सतह की छानबीन में संलग्न है। सौरमंडल से बाहर जाकर दूसरे जीवन की खोज को एक नया आयाम तब मिला, जब 1972 में अमेरिका द्वारा छोड़ा गया यान ‘पायनियर-10’ हमारे सौरमंडल से बाहर निकल गया. इस यान की खूबी यह है कि इसमें प्रसिद्ध विज्ञानी कार्ल सैगन और फ्रेंक ड्रेक द्वारा डिजाइन की गई एक धात्विक प्लेट रखी गई है जिस पर स्त्रीपुरुष के रेखांकन के साथ कुछ संदेश पृथ्वीवासियों की तरफ से अंतरिक्ष की बुद्धिमान सभ्यताओं के लिए दिए गए हैं, ऐसा इसलिए किया गया है ताकि यदि इस यान तक किसी एलियन की पहुंच होती है, तो वह पृथ्वी और धरतीवासियों के बारे में एक अनुमान लगा सके। अमेरिकी अंतरिक्ष विज्ञानी फ्रेंक ड्रेक का एक योगदान यह भी है कि उन्होंने 60 के दशक में प्रोजेक्ट ओज्मा की शुरुआत की थी। इस परियोजना के तहत 26 मिलीमीटर व्यास का एक रेडियो टेलीस्कोप अंतरिक्ष से आए रेडियो संकेतों को पकडऩे के लिए लगाया गया था। इसी तरह मिशन ‘द ब्रेकथ्रू लिसेन’ के अंतर्गत अमेरिका के वेस्ट वर्जीनिया में स्थित ग्रीन बैंक ऑब्जरवेटरी में 100 मिलीमीटर व्यास का एक रेडियो टेलीस्कोप लगाया गया है। एक अन्य टेलीस्कोप ऑस्ट्रेलिया की पार्क्स ऑब्जरवेटरी में लगाया गया है, जिसका व्यास 64 मिलीमीटर का है।


एलियंस की खोज का सबसे रोचक मिशन मई, 1999 में शुरू हुआ जब अमेरिका में इस बारे में एक वेबसाइट सेटीक्होम लॉन्च की गई. इसमें कोई भी व्यक्ति अनजान अंतरिक्ष सभ्यताओं से मिले संकेतों को वेबसाइट पर डाल सकता है और उनकी सत्यता के बारे में जानकारी ले सकता है. फिलहाल इस वेबसाइट के माध्यम से किसी भी एलियन संकेत की पुष्टि नहीं हुई है। परग्रही सभ्यताओं की खोज के लिए वर्ष 2009 में शुरू किए गए ‘केपलर मिशन’ को एक महत्वपूर्ण पड़ाव कहा जा सकता है. केपलर असल में एक स्पेस टेलीस्कोप है, जिसका मकसद करीब एक लाख तारों की बारीक पड़ताल करके यह पता लगाना है कि, उनमें से कितने ग्रह हमारी पृथ्वी जैसे हैं और उनमें जीवन की कोई संभावना है या नहीं, हालांकि ‘द ब्रेकथ्रू लिसेन’ को अब इस दिशा में एक गंभीर कोशिश माना जा सकता है, इसलिए उम्मीद है कि जल्दी ही हम सभी कह सकेंगे कि कोई मिल गया।






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