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अपने बच्चों को खतरनाक खेल और खिलौनों से बचाएं

आज समय आ गया है कि अभिभावक अपने बच्चों पर गहरी नजर रखें कि उनका बच्चा स्मार्ट फोन, लैपटॉप व कम्प्यूटर पर ही तो दिनभर खेल में बिजी नहीं रहता. बच्चे आदिकाल से ही खिलौने देखकर खुश होते रहे हैं। रंग-बिरंगे, हंसते-बोलते, गाते, चलते-फिरते खिलौने किसे अच्छे नहीं लगते? बच्चे तो खिलौने के दीवाने होते हैं. नवजात शिशु भी खिलौना देखकर रोतेरोते चुप हो जाता है. भारत सहित दुनियाभर में आज खिलौने की मांग बढ़ी है. कम्प्यूटर गेम आने के बावजूद खिलौने और लोकप्रिय हुए हैं. पहले जापानी खिलौनों की दुनिया भर में धूम थी किन्तु आज चीन निर्मित खिलौने, पूरी दुनिया में छाए हुए हैं।


खिलौनों का आविष्कार कब कैसे हुआ इसके ठीकठीक प्रमाण तो नहीं मिलते किन्तु चीन व भारत में आदिकाल से खिलौनों से बच्चों के खेलने का उल्लेख मिलता है. भारत की एक लोककथा के अनुसार सबसे पहले झुनझुने का आविष्कार हुआ. झुनझुने की आवाज से नवजाव शिशु भी रोतेरोते चुप हो जाता था. एक राजा की रानी बच्चा जनने के बाद जंगल में चली गई, जहां उसकी मौत हो गई. मां के बगैर बच्चा चुप नहीं हो रहा था. तब राजा जंगल में गए और जहां रानी की मृत देह मिली वही खड़े नरकुल की झाड़ी से उन्होंने पहला झुनझुना बनाया था, जिसके बजाते ही बच्चा चुप हा गया था. एक जमाना था जब खिलौना बेचने वाले गलीगली गाते-घूमते थे, ‘जिसके होयगा खिलइगा, वही लेगा चिरइया’।

पहले पेड़, पत्तों से खिलौने बनाए जाते थे, फिर कच्ची मिट्टी और फिर रूई, कपड़ा सिलकर चिडिय़ा, हाथी, घोड़े, शेर, गुडिय़ा, ग्वाला, राजारानी बनाए जाने लगे. कपड़ों के खिलौनों के अंदर भूसा भरकर उन्हें बनाया जाता है. मिट्टी व कपड़ों के रंग-बिरंगे खिलौने वर्षों तक बच्चों को लुभाते रहे हैं. किन्तु बीसवीं शताब्दी में तो खिलौने की दुनिया ही बदल गई. प्लास्टिक, स्टील, चीनी मिट्टी, मोम, कपड़ा, मिट्टी के ऐसे खिलौने बाजार में आए कि कहना क्या. बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक व इक्कीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में खिलौनों की दुनिया में जबरदस्त बदलाव आया. आज भारत में वर्ष भर में 300 करोड़ से अधिक के खिलौने बिक रहे हैं. चीनी खिलौनों से ही आज सभी खिलौना निर्माता कम्पनियों की प्रतिस्पर्धा है. चीन के बाद कोरिया, ताइवान और स्पेन से भी खिलौने आयात किए जा रहे हैं।


पहले की अपेक्षा आज खिलौनों की दुनिया बदल गई है. दिल्ली, मुम्बई, बैंगलुरू ‘ट्वॉय मार्केट’ की बात छोड़ दें तो आज छोटे से छोटे शहर में भी बैटमोबाइल, टर्बोकार, बुलेट ट्रेन, रिमोट चालित सुपरसोनिक विमान, रोबोट मिल जाएंगे. फिर दिल्ली व बैंगलुरू के खिलौना बाजार के तो कहने ही क्या. अगर बच्चा यहां पहुंच जाए तो वह दुनिया भर की दौलत खिलौने की खरीदारी में ही खर्च कर देगा। किण्डर गार्डेन तथा माण्टेसरी स्कूलों की सफलता का राज ही खिलौने हैं. क्योंकि इन विद्यालयों में खेल-खिलौनों के माध्यम से ही शिक्षा की शुरूआत की जाती है. गिनती सीखने के लिए गोलियां व वर्णमाला सीखने के लिए खिलौने आज भी प्रयोग में लाए जाते हैं। आज, खिलौना निर्माताओं ने संचार युग में बच्चों के लिए समय के अनुरूप खिलौने बनाए हैं. फंसकूल, मैटल, लीगो जैसी कम्पनियां तो सिर्फ खिलौने ही बनाती हैं. दिल्ली के कनॉट प्लेस में जहां खिलौने की बड़ी दुकानें हैं. भारत के अलावा विदेशों के भी खिलौने मिलते हैं. वर्ष 1998 में 2001 तक बचों में पिस्टल, ए.के.-47, तोपें, टैंक, लड़ाकू जहाज, रिमोट चालित फौजें ज्यादा लोकप्रिय थीं. अब दुनिया की कई सरकारों ने इन खिलौनों की बिक्री सीमित करने के प्रयास किए हैं. एक सर्वेक्षण में पाया गया था टीवी देखने तथा हथियारों के स्वाचालित खिलौने बच्चों को हिंसक बनाते हैं. कई कम्प्यूटर, मोबाइल गेम बेहद खतरनाक हैं।


आज चीनी सिन्ड्रोम सस्ते व आकर्षक हैं। चिडिय़ा, गुडिय़ा से लेकर कम्प्यूटर लर्निंग सिस्टम भी मात्र 1500 रुपए में उपलब्ध है. मैटल कम्पनी ने बच्चों को कम्प्यूटर सीखने के लिए एक खिलौना कम्प्यूटर ‘‘स्मार्टनिक्स लर्निंग कम्प्यूटर’’ बनाया. इस खिलौने में एक कीबोर्ड, एक सीडी रोम और अन्य उपकरण हैं. इससे बच्चा कम्प्यूटर सीख सकता है. यह 1500 से 2000 में उपलब्ध है. बार्वी लैपटॉप 2500 से 3000 के बीच में आता है और इससे बच्चे अक्षर, गिनती, लिखना-पढऩा सीख सकते हैं. शिशुओं के लिए जिम्नेशियम, उडऩे, नाचने-गाने वाली गुडिय़ा, कहानीकविता, लोरी सुनाने वाली फर्बिश बेबी तथा भौंकने वाला पू.ची. कुत्ते का पिल्ला भी दुकानों में उपलब्ध है. उच्च वर्ग ही नहीं अब मध्य वर्ग के बच्चों के घरों में भी बच्चों को इन खिलौने से खेलते हुए देखा जा सकता है. अब तो गाने वाली कोयल, उडऩे वाला कबूतर, काम करने वाला रोबोट बच्चों को खूब भार रहे हैं. घर के अंदर छत तक की ऊंचाई में उडऩे वाले रिमोट चालित लड़ाकू विमान, राकेट, मिसाइल बच्चों की पसंद के खिलौने बन चुके हैं। 6वीं में पढऩे वाली रूपाली के पिता एक बैंक में बड़ी अफसर हैं. रूपाली कहती हैं कि ट्वॉय पार्क में उसे बैटरी से संचालित नन्हा रोबो भा गया तो उसे घर ले आई. यह खिलौना रोबो रिमोट के इशारे पर बस्ता उठा लाता है. पानी का गिलास दे देता है. इसका चलना बहुत अच्छा लगता है, बिल्कुल नपे-तुले पैर रखता है. खिलौने की दुकानों में असली का मजा देते खिलौना वाहन मिलते हैं. 15 से 20 हजार रुपए में खिलौना मोटर साइकिल मिल जाती है. जिसे लॉन, घर के अंदर चलाया जा सकता है. ब्रेक, गियर, एक्सीलेटर सबकुछ असली. बस देखने में मोटर साइकिल का बच्चा लगती है. 35 से 40 हजार में दो सीट वाली खिलौनाकार भी भारतीय बच्चों को पसंद आ रही है. मम्मी, पापा, बहन, भाई या दोस्त के साथ बैठकर इस घर व अंदर या पार्क में घूमने का मजा लिया जा सकता है. जीपें, रेल गाडिय़ां, हवाई व पानी वाले जहाज भी 30 से 40 हजार में उपलब्ध हैं. इलेक्ट्रानिक चिडिय़ा, गुडिय़ा, गुड्डे, सैनिक, हथियार, वाहन, टीवी वीडियो फोन, मकान आदि न जाने कितने तरह के खिलौने आज आ गए हैं. खेल, शिक्षा, विज्ञान की जानकारी वाले खिलौने, विद्यालयों में ज्यादा लोकप्रिय हैं. लोग आज समझ गए हैं कि बच्चों के विकास के लिए खिलौने बहुत जरूरी हैं. इस कारण हर घर में खिलौने खरीदे जाने लगे हैं. अभी भारत में 70 प्रतिशत खिलौने विदेशी कम्पनियों के बनाए हुए होते हैं. अब तो 60 प्रतिशत खिलौने चीन से आयात किए जाते हैं. मात्र 30 प्रतिशत खिलौने भारतीय कम्पनियां बनाती हैं. दिल्ली में गुडिय़ा घर दर्शनीय है किन्तु अब ट्वॉय सिटी बनाए जाने की योजना है, जिसमें दुनिया भर के सारे खिलौने होंगे. दुनिया के कई देशों में खिलौना संग्रहालय हैं. भारत में कई लोगों ने निजी स्तर पर खिलौना संग्रहालय बनाए हैं. खिलौना पार्क भी अब कई शहरों में बनाए जा रहे हैं।

एक बहुराष्ट्रीय खिलौना निर्माता कम्पनी मेटल तथा एक स्वयं सेवी संस्था सेवक चिल्ड्रेन इंडिया में चार महानगरों में रईस घरों के बच्चों से उनके पुराने खिलौने इक्ट्ठा करके उन्हें ठीक करके सजासंवार कर गरीब बच्चों में बांटने का अभियान चलाया है ताकि जो बच्चे अपने माता-पिता की गरीबी के कारण खिलौने से वंचित रह जाते हैं, वे भी खिलौने से खेल सकें. कम्प्यूटर व स्मार्ट फोन के गेम कहीं भी खेले जा सकते हैं. ये मनोरंजक व ज्ञानवर्धक भी होते हैं पर ब्ल्यू ह्वेल गेम जैसे अन्य कर्ठ खेल बहुत खतरनाक हैं।






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